नमामि शम्भु शंकरा
जटा में गंग धार है, गले में रुद्र माल है |
प्रचंड है, अखंड है, विरूपाक्ष तू, शितिकंठ है |
जिसे आठों याम पूजते, तू देव वो आराध्य है |
तू साध दे वो हर मरज़, इस जग में जो दुस्साध्य है |
है भोला है तू शंकरा, जग में जो भी था विष भरा |
तू नीलकंठ बन गया, ये विश्व तुझसे ही तरा |
पिनाकी, शम्भु, शशिशेखरा, शिपिविष्ट, कपर्दी, शंकरा
त्रिपुरान्तक, वृषांक, हवि, परमात्मा | तू ब्रह्म, तू ही आत्मा |
तू सत्य है, अनंत है, तू चन्द्र भाल सोहना |
देव सारे कर रहे , शिव चरणन् वंदना |
हिमगिरि की चोटी पर, करता जो तू निवास है |
प्रथम पूज्य गणेश में भी, तेरा ही तो वास है |
सती का सत्व तू बना, तू सत्य, शिव, तू सुंदरा |
तू सृष्टि, तू प्रलयंकरा, नमामि शम्भु शंकरा |
नमामि शम्भु शंकरा |
अभिलाषा माथुर 'मधु' - अजमेर

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