अपनी तरह की समस्त कामकाजी महिलाओं को समर्पित मेरी कविता "नौकरीपेशा" ।
##"नौकरीपेशा"##
वैसे तो मैं नौकरीपेशा हूँ |
पर कभी – कभी ये विचार,
लगने लगता है अभिशाप – सा |
जब मिलते हैं ताने,
घर को सँवार कर न रख पाने के |
जब मिलते हैं उलाहने,
अव्यवस्थित जीवन शैली पर |
जब रिश्तेदार कह दें,
कि बच्चों की परवरिश नहीं कर पाई मैं |
जब लोग कह दें कि,
समय नहीं है माँ को बच्चों के लिए,
जब बोल दे कोई कि,
व्यस्त हो सिर्फ पैसे कमाने में |
अब उन्हें कैसे समझाऊँ,
कि ये नौकरी, ये पैसे और ये अनचाही व्यस्तता
सब इन्हीं बच्चों के लिए तो हैं |
मैं नहीं हूँ मशीन,
जिसके बटन दबा देने पर,
हर काम सलीके से हो |
मैं नहीं हूँ सुघड़ गृहिणी,
जो एक साथ सब संभाल सके |
कैसे कहूँ तुम्हें कि,
नहीं पसंद मुझे भी अपना,
अस्त – व्यस्त सा जीवन,
थक जाता है कभी – कभी,
मेरा भी तन – मन |
काश ! मेरी व्यस्तताओं का समय कुछ अल्प होता |
मेरे पास भी केवल घर को सजाने का विकल्प होता |
फिर तुम देख पाते शायद,
मेरी कुशलता की गहराइयों को |
खिड़की का पर्दा हटाकर,
देती मैं भी कुछ क्षण तन्हाइयों को |
पर क्या है ना,......तुम देख नहीं सकते वहाँ से,
जहाँ से मैं अपनी दुनिया को देखती हूँ |
जहाँ मैं हर वक़्त खड़ी होती हूँ |
तूफ़ानों से लड़ने की जिद पर अड़ी होती हूँ |
तुम जिसे आज़ादी कहते हो ना,
उन बेड़ियों में मैं जकड़ी होती हूँ,
बस ऐसे ही मैं साल – दर – साल बूढ़ी और बड़ी होती हूँ |
क्योंकि मैं नौकरीपेशा हूँ |
और मुझे हमेशा ऐसा होना ही पड़ेगा,
तुम्हारे चाहने न चाहने से,
रुकने वाला नहीं है कुछ भी,
क्योंकि मुझे पूरी करनी है,
मेरे परिवार की जरूरतें,
मेरे बच्चों की इच्छाएँ,
और अपने व्यक्तित्व की अपूर्णताएँ |
बस इसलिए मैं नौकरीपेशा हूँ |