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Monday, September 6, 2021

अंतर्मन की बातें-डॉ. महावीर प्रसाद जोशी

 *अंतर्मन की बातें*

मचाये धड़कनें जब शोर।
रुलाये तड़पनें घनघोर।।

विकल्प मोबाइल मुलाकातों का।
सिलसिला अंतर्मन की बातों का।।

       जब मन का मन से मिलन हो।
       भावना भाव की दुल्हन हो।।

       विनिमय नज़रों की सौगातों का।
       सिलसिला अंतर्मन की बातों का।

यादों के सागर में,कागज की कस्ती।
तन्हाई के पहरे में,सपनों की मस्ती।।

जब फूटता लावा जज़्बातों का।
सिलसिला अंतर्मन की बातों का।।

      प्यार पर परिपक्वता का ओज।
      शबाब को शालीनता का भोज।।

      बंधन सामाजिक हालातों का।
     सिलसिला अंतर्मन की बातों का।।

प्रणय बाद का बसंत हो।
सुदूर नायिका का कंत हो।।

सफ़र करवटें भरी रातों का।
तब ख़्वाब अंतर्मन की बातों का।।




Saturday, September 4, 2021

कभी तो दो पल पास बैठो हमारे -डॉ राजमती पोखरना सुराना

 कभी तो दो पल पास बैठो हमारे ,

कुछ तुम सुनाओ अपने दिल की दास्ताँ
कुछ हम सुनाये हाल- ए-दास्ताँ अपनी ,
गम़ तो यू  बहुत है ज़हान में फिर भी
कभी तो दिल को आराम देकर तो देखो
दो वक्त हमारे करीब आकर तो बेठो ...


हम तो अब भूल गये वो बिती बातें 
तुम भी सब भूला कुछ तो आगे बडों 
मन तो कब रहा एक सा ...............
पल में तोला तो पल में माशा ......
हाल -ए -दिल  जानकर क़रीब तो आकर बेठो.


उदासियों के बादल कब छन्ट जायेंगे..
कब तुम परम आनन्द में खो जाओगे .
भूल कर सारे गम अपने ............कब ..
ज़न्दगी  े मायने समझ जाओगे ..तो फिर
ज़िन्गीद मे  कभी तो दो पल पास आकर बेठो।।




क्या कहेंगे लोग?- डाॅ.महावीर प्रसाद जोशी

क्या कहेंगे लोग?

दुनिया का सबसे बड़ा रोग ,मित्रों।
फिर हमको क्या कहेंगे लोग,मित्रों।।

प्रभु की करते हैं अनदेखी प्रतिदिन, 
मानव इसकी सजा रहा है भोग,मित्रों।

होती मानव की मानव से नफ़रत, 
उसके मित्र बनते हैं,डाॅग,मित्रों।।

खेती,धंधे,शिक्षा,सबकुछ चोपट,
अब ओझल हैं कुटिल उद्योग, मित्रों।

बीड़ी,शराब,गाँजा,गुटखा,आदि का,
होता है रात-दिन उपयोग, मित्रों।।

बकरे की माँ तो रोती है उम्र भर, 
बरसों से अटल है संजोग,मित्रों।


          

Friday, September 3, 2021

अद्वैत हो रहा प्रेम मेरा-श्रीमती मीनाक्षी त्रिवेदी,'

 अद्वैत हो रहा प्रेम मेरा*

























मेरे रोम रोम में, 
श्याम बसे,
श्याम संग नाता है अटूट!

जीवन जीना है,
श्याम संग,
जीवन का अंत भी,
श्याम संग,
श्याम की प्रीत में, 
रंग गई,
श्याम से मेरी,
प्रेम सगाई!
अब,दुनिया दारी मैं भूल गई!
जो भी करना,
जो भी धरना,
अद्वैत हो रहा प्रेम मेरा।।

अब खुशियाँ भी
तेरे संग संग,
और गम भी, 
तेरे संग संग,
सर्वस्व किया, 
अर्पण तुमको,
अद्वैत हो रहा प्रेम मेरा।।

जब भी विचलित,
हो जाये मन!
एक तारा लेकर,
निकल पडूँ, 
तेरी भक्ति में, 
मैं लीन रहूँ, 
अद्वैत हो रहा प्रेम मेरा।।

🌹🌹🌹🌹
श्रीमती मीनाक्षी त्रिवेदी,'मौनी' वडोदरा


Thursday, September 2, 2021

नौकरीपेशा-अभिलाषा माथुर 'मधु'

 अपनी तरह की समस्त कामकाजी महिलाओं को समर्पित मेरी कविता "नौकरीपेशा" । 


                       ##"नौकरीपेशा"## 

वैसे तो मैं नौकरीपेशा हूँ |
पर कभी – कभी ये विचार,
लगने लगता है अभिशाप – सा |
जब मिलते हैं ताने,
घर को सँवार कर न रख पाने के |
जब मिलते हैं उलाहने, 
अव्यवस्थित जीवन शैली पर |

जब रिश्तेदार कह दें,
कि बच्चों की परवरिश नहीं कर पाई मैं |
जब लोग कह दें कि,
समय नहीं है माँ को बच्चों  के लिए,
जब बोल दे कोई कि, 
व्यस्त हो सिर्फ पैसे कमाने में |

अब उन्हें कैसे समझाऊँ,
कि ये नौकरी, ये पैसे और ये अनचाही व्यस्तता 
सब इन्हीं बच्चों के लिए तो हैं |
मैं नहीं हूँ मशीन,
जिसके बटन दबा देने पर,
हर काम सलीके से हो |
मैं नहीं हूँ सुघड़ गृहिणी,
जो एक साथ सब संभाल सके |

कैसे कहूँ तुम्हें कि,
नहीं पसंद मुझे भी अपना,
अस्त – व्यस्त सा जीवन,
थक जाता है कभी – कभी,
मेरा भी तन – मन |

काश ! मेरी व्यस्तताओं का समय कुछ अल्प होता |
मेरे पास भी केवल घर को सजाने का विकल्प होता |
फिर तुम देख पाते शायद,
मेरी कुशलता की गहराइयों को |
खिड़की का पर्दा हटाकर,
देती मैं भी कुछ क्षण तन्हाइयों को |

पर क्या है ना,......तुम देख नहीं सकते वहाँ से,
जहाँ से मैं अपनी दुनिया को देखती हूँ |
जहाँ मैं हर वक़्त खड़ी होती हूँ |
तूफ़ानों से लड़ने की जिद पर अड़ी होती हूँ |
तुम जिसे आज़ादी कहते हो ना,
उन बेड़ियों में मैं जकड़ी होती हूँ,
बस ऐसे ही मैं साल – दर – साल बूढ़ी और बड़ी होती हूँ |

क्योंकि मैं नौकरीपेशा हूँ |

और मुझे हमेशा ऐसा होना ही पड़ेगा,
तुम्हारे चाहने न चाहने से,
रुकने वाला नहीं है कुछ भी,
क्योंकि मुझे पूरी करनी है,
मेरे परिवार की जरूरतें,
मेरे बच्चों की इच्छाएँ,
और अपने व्यक्तित्व की अपूर्णताएँ |
बस इसलिए मैं नौकरीपेशा हूँ | 

                                          


नारी नहीं मानेगी हार , करेगी प्रहार !- रविकान्त सनाढ्य

 नारी नहीं मानेगी हार , करेगी प्रहार !

बन्द मुट्ठी में
 कसकर  बाँधने की 
तुम्हारी आदत 
आदिमयुग  से है 
नारी को ! 
बहुत सह लिया 
प्राचीन और 
मध्ययुग की नारी ने ! 
आधुनिकयुग की 
नारी से यह अपेक्षा 
मत करो ! 
वह तुम्हारी न तो चेरी है 
और न ही दासी ! 
वह शृंखलाओं को 
तोड़ना जानती है , 
रखती है स्वतंत्र विचार ! 
शिक्षा ने कर दिया है 
उसकी सोच में 
आमूलचूल परिवर्तन ! 
तुम यह न समझना कि 
उसका विज़न संकीर्ण 
 और थोड़ा है , 
उसके हाथ में
बंधक मानसिकता के 
भंजन हेतु  छैनी और हथौड़ा है 
वैचारिक क्रान्ति का ! 
अब नारी
 विजय -उद्घोषकर 
जाग उट्ठी , 
अब खुलकर रहेगी 
तुम्हारी आततायी मुट्ठी !!

















Wednesday, September 1, 2021

श्रीनाथ जी के कवित् का प्रेषण - रविकान्त सनाढ्य




अजब सिंगार अरु ग़ज़ब लुनाई देखो , 
रंग औ उमंग की भी नई ही मिसाल है ।
रस-अवतार आप चिर हैं युवान श्रीजी 
मोह रहे अह-निस वृद्ध औ अबाल हैं ।
सरल के सखा आप खलन के काल प्रभु 
आप हैं,उदार अति हृदय बिसाल है ।
त्राण देते सबन के राखा आप बनवारी , 
आपके आगे न टिके बिपद को जाल है ।।








अंतर्मन की बातें-डॉ. महावीर प्रसाद जोशी

  *अंतर्मन की बातें* मचाये धड़कनें जब शोर। रुलाये तड़पनें घनघोर।। विकल्प मोबाइल मुलाकातों का। सिलसिला अंतर्मन की बातों का।।        जब मन का ...