नारी नहीं मानेगी हार , करेगी प्रहार !
बन्द मुट्ठी में
कसकर बाँधने की
तुम्हारी आदत
आदिमयुग से है
नारी को !
बहुत सह लिया
प्राचीन और
मध्ययुग की नारी ने !
आधुनिकयुग की
नारी से यह अपेक्षा
मत करो !
वह तुम्हारी न तो चेरी है
और न ही दासी !
वह शृंखलाओं को
तोड़ना जानती है ,
रखती है स्वतंत्र विचार !
शिक्षा ने कर दिया है
उसकी सोच में
आमूलचूल परिवर्तन !
तुम यह न समझना कि
उसका विज़न संकीर्ण
और थोड़ा है ,
उसके हाथ में
बंधक मानसिकता के
भंजन हेतु छैनी और हथौड़ा है
वैचारिक क्रान्ति का !
अब नारी
विजय -उद्घोषकर
जाग उट्ठी ,
अब खुलकर रहेगी
तुम्हारी आततायी मुट्ठी !!


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